Habib tanveer(hindi)

रंगमंच की चेतना: हबीब तनवीर

Tanveer ji's image

प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर, इन दिनों गंभीर रूप से बीमार हैं और भोपाल के एक अस्पताल में भर्ती हैं। गौरतलब है कि 10 मई की रात तीव्र अस्थमा अटैक पड़ने के बाद उन्हे अस्पताल में भरती करवाया गया, अभी हालांकि उनकी सेहत में मामूली सुधार जरूर हुआ है, लेकिन हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है।
हबीब तनवीर वो शख्सियत हैं, जिन्होने इस देश के रंगमंच के एक पूरे युग को जीया है, इसके वतर्मान स्वरूप को विकसित किया है। अभी भी 85 वर्ष की आयु में वो पहले की भांति ही रंग-सृजन में पूरे जोश के साथ व्यस्त रहते हैं। 1959 में यूरोप से थियेटर का अध्यन करने के बाद हबीब जी ने स्वदेश लौटकर, भोपाल में ``नया थियेटर´´ की नींव रखी, और इस कार्य में उन्हे अपनी पत्नी ´´मोनिका जी´´ का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ। हबीब जी के नाटकों में अब तक ग्रामीण भारत की सशक्त आवाज बुलंद हुयी है, हर सामाजिक बुराई पर उनके नाटकों ने गहरा कुठाराघात किया है। सफदर हाश्मी जैसी प्रतिभाओं को तराशने में भी हबीब जी का बेमिसाल योगदान रहा है। उनका नये थियेटर की जड़ें हालांकि सिर्फ भोपाल से ही जुड़ी रहीं, लेकिन इसकी गूंज देश के हर भाग में समय समय पर सुनायी पड़ती रही है, हबीब साहब इतनी उम्र होने के बावजूद भी देश के अलग अलग भागों में अपने नाटकों के प्रदर्शन के लिये अक्सर दौरे पर रहते हैं। यूं तो हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था रही है, जहां और किसी चीज़ की स्वतंत्रता हो या न हो, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यहां पर दावा जरूर किया जाता है। किंतु फिर भी यह कहते हुये अत्यंत खेद होता है, कि इस प्रख्यात नाट्यकर्मी को परेशान करने में आर.एस.एस-बीजेपी के गुंडो ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है, और उनके नाटकों को बाधित करने के लिये किसी भी टुच्चे तरीके का प्रयोग करने से यह असामाजिक तत्व नहीं चूकते। पोंगा पंडित जैसे उनके नाटकों को हिंदू धर्म के खिलाफ बताया गया है, जबकि यह नाटक तो उस वर्ण व्यवस्था पर प्रहार करता है, जो स्वतंत्र भारत को अपनी रूढ़ियों में जकड़े है।
ऐसा नहीं है कि हबीब साहब की प्रतिभा सिर्फ नाटकों तक ही सीमित रही है, कविता, पटकथा के अलावा, उन्होने फिल्मों में भी बखूबी अभिनय किया है। कौन भूल सकता है, ``ब्लैक एंड व्हाईट´´ फिल्म में उनके द्वारा निभाये गये बूढ़े दादाजी के किरदार को, जिसके कारण फिल्म संवेदना की एक अमिट छाप छोड़ पाती है। आमिर खान की फिल्म ``मंगल पांडे-कि राईजिंग´´ में हबीब साहब ने बहादुर शाह जफ़र के किरदार के रूप में एक लघु भूमिका निभायी है।
मुझे अब भी याद है, कई बरस पहले उनसे हुयी मेरी संक्षिप्त सी मुलाकात, जिसकी संक्षिप्तता और भी ज्यादा इसलिये बढ़ गयी थी, क्योंकि उनका नाटक उस समय स्टेज पर चल रहा था, लेकिन इससे एक बात तो यकीनन पता चलती है, कि हबीब साहब के लिये उनके नाटक सिर्फ नाटक ही नहीं हैं, बल्कि उस हमसफर की तरह हैं, जो पूरे जीवन उनके साथ रहा है।
अभी तो हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि हबीब साहब जल्द ही ठीक हो जायेंगे और हम उन्हे किसी रंगमंच पर उनके किसी बेहतरीन नाटक में अभिनय करते हुए देख रहे होंगे।

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